जंगली जानवर, जंगलों से विलुप्त हो रहे हैं. बहुत सी प्रजातियां हैं, जिनके पूरी तरह से ख़ात्मे का ख़तरा मंडरा रहा है.
ऐसे में हम आप को बताएं कि शहरों का जंगलीकरण, इन जीवों को वापस शहरों में ला रहा है, तो शायद आप को बात क़ाबिल-ए-यक़ीन न लगे. पर है ये सौ फ़ीसदी सच्ची बात.
पश्चिमी देशों में बहुत से शहर जंगली पशु-पक्षियों से आबाद हो रहे हैं. इनमें शिकारी पक्षियों से लेकर, तितलियों और दूसरे कीड़े-मकोड़ों तक की नस्लें शामिल हैं.
लंदन के बेहद व्यस्त वेस्ट एंड इलाक़े में बेहद दुर्लभ होता पक्षी देखा जाने लगा है. हालांकि इनकी तादाद बहुत कम है. मगर, इन जंगली पक्षियों का लंदन के व्यस्त हिस्से में आबाद होना ही बहुत चौंकाने वाली बाती है.
इस विलुप्त होते पक्षी का नाम है ब्लैक रेडस्टार्ट. माना जाता है कि पूरे इंग्लैंड में इस प्रजाति के पक्षियों के 20 से 40 जोड़े ही होंगे. लेकिन, हाल के बरसों में इन्हें सेंट्रल लंदन में देखा गया है.
वैसे, केवल ये परिंदा ही शहर में आकर बसा हो, ऐसा भी नहीं. बहुत से कीड़े, तितलियां, कठफोड़वा पक्षी और चमगादड़ों की कुछ प्रजातियां भी शहरों में अपना आशियाना बना रही हैं. आम तौर पर ये जीव-जंतु ग्रामीण अंचलों में ही पाये जाते थे. लेकिन, अब ये लंदन के व्यस्त इलाक़ों में भी ठिकाना बनाने लगे हैं.
जंगली और विलुप्त होते जीवों का शहरों में आबाद होना सिर्फ़ लंदन में देखने को मिल रहा है, ऐसा नहीं है.
न्यूयॉर्क में आप को दुनिया का सबसे तेज़ शिकारी माना जाने वाला पेरेग्राइन बाज़ बहुमंज़िला इमारतों के बीच गोते लगाता दिख जाएगा.
एक दौर ऐसा भी था, जब पेरेग्राइन बाज़ को विलुप्त मान लिया गया था. लेकिन, अब ये न्यूयॉर्क की बहुमंज़िला इमारतों के बीच अक्सर उड़ता दिख जाता है.
जंगली जीवों का शहरों में दिखना यूं ही नहीं हो रहा है. इसके लिए इन शहरों में ख़ास प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं. इन्हें अंग्रेज़ी में 'अर्बन रिवाइल्डिंग प्रोजेक्ट' यानी शहरों का जंगलीकरण कहते हैं. अब ऊंची इमारतों की छतों पर हरित पट्टियां विकसित की जा रही हैं. ताकि शहरियों के बीच ये जंगली जीव भी आबाद हो सकें. एक ऐसे ही प्रोजेक्ट के तहत दफ़्तर में मधुमक्खियों का छत्ता लगाने का काम हो रहा है.
लंदन की आर्किटेक्ट एमिली वुडैसन ऐसे ही प्रोजेक्ट डिज़ाइन करती हैं. एमिली कहती हैं कि आप को शहर की बनावट और बसावट को पूरी तरह बदलनी ज़रूरत नहीं है. बस इमारतों के जंगल के बीच हरियाली विकसित करने की ज़रूरत है. ऐसा घरों की छतों, बहुमंज़िला इमारतों के टैरेस और दीवारों पर भी हो सकता है.
लंदन में ज़मीन के छह बड़े मालिकों के साथ मिलकर द वाइल्ड वेस्ट एंड प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है. इसके तहत हर सौ मीटर की दूरी पर हरियाली वाली पट्टी विकसित की जा रही है, जिसका दायरा क़रीब 100 वर्ग मीटर होगा.
एमिली कहती हैं कि ये महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है. इसके तहत लंदन के पार्कों को जोड़ने वाली हरित पट्टी विकसित करने की योजना है.
हरियाली भरी पट्टियां विकसित करने के साथ बहुत से ज़मीन मालिक मौजूदा इमारतों में ही हरी-भरी दीवार और छतें विकसित कर रहे हैं. मतलब ये कि दीवारों पर ही हरियाली उगाई जा रही है और छतों में छोटे बागीचे लगाए जा रहे हैं. अब तक जो प्रगति है, उससे लगता है कि ये नुस्खे काम आ रहे हैं. इन कोशिशों का ही नतीजा है कि लंदन से ग़ायब हो चुके कई जीव वापस दिखने लगे हैं. ब्लैक रेडस्टार्ट इसका एक नमूना है.
एमिली कहती हैं कि, 'हम दूसरे जीवों को लुभाने के लिए शहरों में चट्टानों या लकड़ी का ढेर लगा सकते हैं. इससे कई तरह के कीड़े शहरों की तरफ़ आएंगे. दूसरी प्रजातियां भी इस तरह से शहरों में आबाद होंगी. किसी पक्षी के रहने के लिए ये ठिकाने आदर्श जगह बन सकते हैं.'
जंगली और दुर्लभ जीवों को शहरों की तरफ़ आकर्षित करना सिर्फ़ अच्छा महसूस होना भर नहीं है. इससे शहरी जीव में विविधता आती है. शहर का नज़ारा दिलकश होता है. ऐसे प्रोजेक्ट से शहर की तरफ़ आकर्षित किए गए जीव हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत अहम हैं. ये वो जीव हैं, जो फलों और सब्ज़ियों के परागण में अहम रोल निभाते हैं. जैसे कि मधुमक्खियां और तितलियां.
दुनिया भर में तितलियों और मधुमक्खियों की तादाद में भारी गिरावट देखी जा रही है.
पर्यावरण के साथ आर्किटेक्ट की प्लानिंग करने वाली कंपनी टेरेफॉर्म के निदेशक मिशेल जोआचिम कहते हैं कि, 'हमें ये एहसास हो रहा है कि योजना बनाने, विकास करने, आर्किटेक्चर और औद्योगिक डिज़ाइन ने मिलकर बहुत से जीवों की नस्ल पर तबाही बरपायी है. हम शहरों का जंगलीकरण कर के, इमारतों की प्लानिंग में बदलाव कर के शहरों को जंगली जीवों के रहने लायक़ बना सकते हैं.'
कई बार इसके लिए आठ मंज़िला पारदर्शी चरागाह विकसित करने जैसा काम भी हो सकता है न्यूयॉर्क के मैनहट्टन इलाक़े में ऐसा ही चरागाह विकसित किया गया है.
इसी तरह उत्तरी अमरीका की मोनार्च तितलियां ख़ात्मे के कगार पर हैं. 1980 के दशक के बाद से ही मिल्कवीड नाम के एक जंगली पौधे को हटाने पर लोगों के ज़ोर देने की वजह से ये शाही तितलियां भी ख़त्म हो रही हैं. वजह ये है कि शाही तितलियां इस मिल्कवीड पौधे पर ही प्रजनन करती हैं और अपने बच्चे पालती हैं.
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