भारत सरकार और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ मैच के बहिष्कार पर सहमत हो गए, तो आईसीसी वर्ल्ड कप के मीडिया अधिकार धारक स्टार इंडिया को बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. हालांकि स्टार इंडिया अन्य बीमा पॉलिसियां खरीदकर संभावित नुकसान से खुद को बचा सकता है.
क्रिकेट के दीवाने देश के प्रशंसक पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों के शहीद होने और उसके बाद की गतिविधियों के मद्देनजर पाकिस्तान से मैच का बहिष्कार करना चाहते हैं. भारत 16 जून को वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपना लीग मैच नहीं खेलता है, तो स्टार इंडिया को विज्ञापन राजस्व मामले में कम से कम 100-120 करोड़ रुपये का नुकसान होगा.
ब्रॉडकास्टर ने न्यू इंडिया एश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया और एसबीआई जनरल इंश्योरेंस से विश्व कप के लिए करीब 1,500 करोड़ रुपये का बीमा कराया है. इकोनॉमिक्स टाइम्स ने करीबी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि न्यू इंडिया एश्योरेंस स्टार इंडिया के लिए प्रमुख बीमाकर्ता है. एक मैच रद्द होने के कारण विज्ञापन हानि को कवर करने वाली यह 1,457 करोड़ रुपये की पॉलिसी है.
इस पॉलिसी में विश्व कप में खेले जाने वाले सभी मैच शामिल हैं. हालांकि, प्रसारक को आतंकवाद के जोखिम के लिए एक अलग पॉलिसी खरीदनी होगी. न्यू इंडिया एश्योरेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की. यूनाइटेड इंडिया एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी के साथ सह-बीमाकर्ता है.
मौसम का हाल तथा आपदाओं के कारण भाग नहीं लेने वाली टीमों की वजह से मैच रद्द होने की स्थिति में यह पॉलिसी कवर करेगी. लेकिन 'मैच बहिष्कार का जोखिम' इस पॉलिसी में शामिल नहीं है. इस साल वर्ल्ड कप मैच में तीन महीने बाकी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि स्टार इंडिया बहिष्कार के जोखिम को कवर करने के लिए आतंकवाद से जुड़ी 'बायकॉट कवर पॉलिसी' खरीद सकता है.
पिछले वर्ल्ड कप में 15 फरवरी 2015 को खेले गए भारत-पाकिस्तान मैच से अनुमानित विज्ञापन राजस्व 93 ब्रांडों से 100-110 करोड़ रुपये था, और उस मैच को ऐतिहासिक 28.8 करोड़ दर्शकों ने देखा. भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने पहली बार 1993 में भारतीय टीम के लिए पॉलिसी ली थी. विश्व कप की बात करें, तो उसने 1996 के वर्ल्ड कप से बीमा पॉलिसी लेनी शुरू की.
भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की सेना ने एक बार फिर बड़ा दावा किया है. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने दावा किया है कि उनके लड़ाकू विमान ने भारत के कई इलाकों में बमबारी की है. उन्होंने कहा कि हमारा मकसद भारत को बताना था कि हमारी सेना में दम है. पाकिस्तानी सेना दावा कर रही है कि उन्होंने भारत के दो पायलटों को अपनी हिरासत में लिया है.
पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने कहा कि हमने अपनी स्ट्राइक में कोशिश की थी किसी को नुकसान ना पहुंचे. हमने 6 टारगेट तय किए थे, जिसके बाद हमने स्ट्राइक किया. बिम्बरगरी समेत कई इलाकों में हमने टारगेट किया. हम बस ये बताना चाहते थे कि हम सबकुछ कर सकते हैं, लेकिन इलाके में शांति के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि हम शांति चाहते हैं युद्ध नहीं करना चाहते हैं. पाकिस्तान के एक्शन के बाद भारत के दो जहाज LoC पर कर पाकिस्तान की सीमा में आए, हमने दोनों को निशाना बनाया. एक भारत की जमीन पर और दूसरा पाकिस्तान की जमीन पर गिरा, दो पायलट को गिरफ्तार किया गया है एक घायल है और दूसरा गिरफ्त में है. उनके पास से कई कागजात मिले हैं.
Wednesday, February 27, 2019
Wednesday, February 20, 2019
जापान के ये पेड़ भविष्य बता सकते हैं
मानव इतिहास की शुरुआत जंगलों से हुई थी. इन्हीं जंगलों में इंसान के बहुत से राज़ भी पोशीदा हैं. ये पेड़ और जंगल इंसान को इस हद तक समझते हैं कि उसका भविष्य तक बता सकते हैं.
और इसकी मिसाल हैं जापान के जंगलों में पाए जाने वाले हिनोकी पेड़ जिनमें जापान में बारिश होने का 2600 साल पुराना रिकॉर्ड मौजूद है. अब इन पेड़ों की मदद से पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि आने वाले समय में जापान में किस तरह का जलवायु परिवर्तन होगा.
उसकी बुनियाद पर हालात से निपटने की रणनीति बनेगी.
ताकेशी नकात्सुका, जापान रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्चर और प्रागैतिहास काल के मौसम के जानकार हैं. वो 68 लोगों की टीम के साथ इस बारे में पिछले एक दशक से रिसर्च कर रहे हैं.
उन्होंने 2800 से 3000 साल पुराने पेड़ों के टुकड़े इकट्ठा किए हैं. जिनके छल्लों में छुपे राज़ समझने की कोशिश हो रही है. ताकि ये पता लगाया जा सके कि बीते ज़माने में जापान में कितनी बारिश होती थी.
रिसर्च में पाया गया है कि हर 400 साल में कुछ समय के लिए जापान में बारिश होने का तरीक़ा बदलता है. जिसकी वजह से कई-कई दशक तक देश ने सैलाब या सूखे की मार झेली.
और इसी के मुताबिक़ जापानी समाज फला-फूला या बुरे हालात का सामना करता रहा. नकात्सुका कहते हैं कि गुज़रे ज़माने में हुई बारिश और जलवायु परिवर्तन के आधार पर भविष्य की आब-ओ-हवा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
आज का मौसम या जीवनकाल पिछले हज़ार या दो हज़ार साल में बहुत ज़्यादा नहीं बदला है.
इस तरह की रिसर्च के लिए जापान का मध्य इलाक़ा सबसे बेहतरीन जगह है, क्योंकि यहां भारी संख्या में हिनोकी पेड़ मौजूद हैं. नकात्सुका ने यहां से 68 हिनोकी पेड़ों के सैम्पल रिसर्च के लिए जमा किए.
ये पेड़ सौ साल से लेकर एक हज़ार साल तक पुराने बताए जाते हैं. अच्छी बात ये है कि नकात्सुका ने रिसर्च के लिए एक नया तरीक़ा ढूंढ निकाला है जिसे आईसोटोप रेशियो कहते हैं. जमा किए गए सैम्पल में ऑक्सीजन आईसोटोप रेशो की जांच की जा रही है.
इसकी बुनियाद पर एक ख़ास दौर के मौसम और माहौल को समझने में मदद मिलती है. नकात्सुका कहते हैं कि इस तरीक़े से उन्हें गर्मी के मौसम में बारिश का अनुमान लगाने में काफ़ी मदद मिली है.
रिसर्च से पता चलता है कि बीते 400 सालों में बारिश बहुत अनियमित रही है. ये बदलाव हर कुछ दशक में देखने को मिलता रहा है.
नकात्सुका अपनी रिसर्च में इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की मदद भी ले रहे हैं. इतिहासकारों के मुताबिक़ मध्यकालीन जापान में बारिश के लिए बड़े पंडितों या पुरोहितों से पूजा कराई जाती थी.
यानी उस दौर में बारिश कम थी. नकात्सुका की रिसर्च भी इसी ओर इशारा करती है. इसी तरह खेती शुरू होने के बाद जिस तरह से पानी संजोने के तरीक़े ढूंढे गए उससे पता चलता है कि उस दौर में बारिश इतनी कम रही होगी कि सूखे के हालात पैदा हो गए होंगे.
सबसे ख़ास बात ये है कि सूखे का ये दौर चीन और जापान में लंबे समय तक दर्ज हुआ है. और उसी के हिसाब ने उस दौर के समाज ने ख़ुद को ढाला.
प्रागैतिहासिक काल के पुरातत्वविद और इतिहासकार कुनिहिको वाकाबयाशी का कहना है कि नई रिसर्च सामने आने से पहले तक वो समाज में हो रहे बदलावों को राज्य निर्माण का तरीक़ा मान रहे थे.
लेकिन अब नकात्सुका की रिसर्च से इस बात पर मुहर लगती है कि इन बदलावों की जड़ में सैलाब या सूखा था.
मिसाल के लिए 1000 ई.पू से लेकर 350 ई. तक यायोई के काल में ज़्यादातर आबादी योडा नदी के पास बसी थी. भरपूर पानी होने की वजह से यहां लोगों ने चावल की खेती शुरू कर दी.
चावल यहां के लोगों का बुनियादी खाना बन गया. लेकिन जैसे-जैसे सैलाब आते थे लोगों दूर जगहों पर जाना शुरू कर देते थे.
हालांकि 100 ई.पू में हालात बदलने लगते थे. तापमान में कमी दर्ज की जाने लगी थी और बारिश में इज़ाफ़ा होने लगा था. लिहाज़ा लोगों ने फिर ऊंचाई वाले इलाक़ों में रहना शुरू कर दिया.
पांचवीं सदी में तो बहुत तेज़ी से नई जगहों पर बसावट देखने को मिलती है. इसमें पहाड़ी इलाक़े मुख्य रूप से शामिल हैं. जहां जाकर बड़ी संख्या में लोग बस गए. तीसरी से छठीं सदी तक घाटी में बमुश्किल ही कोई घर बचा था. समाज में तेज़ी से बदलाव आ रहे थे.
मिसाल के लिए धान की फ़सल के रख-रखाव की ज़िम्मेदार स्थानीय मुखिया को दी जाने लगी. जो लोग पहाड़ों में रहने लगे थे वो खेतिहर मज़दूर बन गए. अपनी मेहनत का उन्हें पूरा हिस्सा मिलना बंद हो गया. मैदानों में जिनके पास छोटे ज़मीन के टुकड़े थे वो अलग हो गए और बड़े टुकड़े वाले अलग. और यहीं से समाज में असमानता, अमीर और ग़रीब की रेखा खिंच गई.
सातवीं सदी तक जब बारिश कुछ हद तक कम हुई तो लोगों ने एक बार फिर पहाड़ों से निकल कर मैदानों की तरफ़ आना शुरू किया. यही वो दौर था जब जापान में बौद्ध धर्म अपनी जड़ें मजबूत कर रहा था. और समाज में रहने के तौर तरीक़ों के लिए क़ानून बन रहे थे.
और इसकी मिसाल हैं जापान के जंगलों में पाए जाने वाले हिनोकी पेड़ जिनमें जापान में बारिश होने का 2600 साल पुराना रिकॉर्ड मौजूद है. अब इन पेड़ों की मदद से पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि आने वाले समय में जापान में किस तरह का जलवायु परिवर्तन होगा.
उसकी बुनियाद पर हालात से निपटने की रणनीति बनेगी.
ताकेशी नकात्सुका, जापान रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्चर और प्रागैतिहास काल के मौसम के जानकार हैं. वो 68 लोगों की टीम के साथ इस बारे में पिछले एक दशक से रिसर्च कर रहे हैं.
उन्होंने 2800 से 3000 साल पुराने पेड़ों के टुकड़े इकट्ठा किए हैं. जिनके छल्लों में छुपे राज़ समझने की कोशिश हो रही है. ताकि ये पता लगाया जा सके कि बीते ज़माने में जापान में कितनी बारिश होती थी.
रिसर्च में पाया गया है कि हर 400 साल में कुछ समय के लिए जापान में बारिश होने का तरीक़ा बदलता है. जिसकी वजह से कई-कई दशक तक देश ने सैलाब या सूखे की मार झेली.
और इसी के मुताबिक़ जापानी समाज फला-फूला या बुरे हालात का सामना करता रहा. नकात्सुका कहते हैं कि गुज़रे ज़माने में हुई बारिश और जलवायु परिवर्तन के आधार पर भविष्य की आब-ओ-हवा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
आज का मौसम या जीवनकाल पिछले हज़ार या दो हज़ार साल में बहुत ज़्यादा नहीं बदला है.
इस तरह की रिसर्च के लिए जापान का मध्य इलाक़ा सबसे बेहतरीन जगह है, क्योंकि यहां भारी संख्या में हिनोकी पेड़ मौजूद हैं. नकात्सुका ने यहां से 68 हिनोकी पेड़ों के सैम्पल रिसर्च के लिए जमा किए.
ये पेड़ सौ साल से लेकर एक हज़ार साल तक पुराने बताए जाते हैं. अच्छी बात ये है कि नकात्सुका ने रिसर्च के लिए एक नया तरीक़ा ढूंढ निकाला है जिसे आईसोटोप रेशियो कहते हैं. जमा किए गए सैम्पल में ऑक्सीजन आईसोटोप रेशो की जांच की जा रही है.
इसकी बुनियाद पर एक ख़ास दौर के मौसम और माहौल को समझने में मदद मिलती है. नकात्सुका कहते हैं कि इस तरीक़े से उन्हें गर्मी के मौसम में बारिश का अनुमान लगाने में काफ़ी मदद मिली है.
रिसर्च से पता चलता है कि बीते 400 सालों में बारिश बहुत अनियमित रही है. ये बदलाव हर कुछ दशक में देखने को मिलता रहा है.
नकात्सुका अपनी रिसर्च में इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की मदद भी ले रहे हैं. इतिहासकारों के मुताबिक़ मध्यकालीन जापान में बारिश के लिए बड़े पंडितों या पुरोहितों से पूजा कराई जाती थी.
यानी उस दौर में बारिश कम थी. नकात्सुका की रिसर्च भी इसी ओर इशारा करती है. इसी तरह खेती शुरू होने के बाद जिस तरह से पानी संजोने के तरीक़े ढूंढे गए उससे पता चलता है कि उस दौर में बारिश इतनी कम रही होगी कि सूखे के हालात पैदा हो गए होंगे.
सबसे ख़ास बात ये है कि सूखे का ये दौर चीन और जापान में लंबे समय तक दर्ज हुआ है. और उसी के हिसाब ने उस दौर के समाज ने ख़ुद को ढाला.
प्रागैतिहासिक काल के पुरातत्वविद और इतिहासकार कुनिहिको वाकाबयाशी का कहना है कि नई रिसर्च सामने आने से पहले तक वो समाज में हो रहे बदलावों को राज्य निर्माण का तरीक़ा मान रहे थे.
लेकिन अब नकात्सुका की रिसर्च से इस बात पर मुहर लगती है कि इन बदलावों की जड़ में सैलाब या सूखा था.
मिसाल के लिए 1000 ई.पू से लेकर 350 ई. तक यायोई के काल में ज़्यादातर आबादी योडा नदी के पास बसी थी. भरपूर पानी होने की वजह से यहां लोगों ने चावल की खेती शुरू कर दी.
चावल यहां के लोगों का बुनियादी खाना बन गया. लेकिन जैसे-जैसे सैलाब आते थे लोगों दूर जगहों पर जाना शुरू कर देते थे.
हालांकि 100 ई.पू में हालात बदलने लगते थे. तापमान में कमी दर्ज की जाने लगी थी और बारिश में इज़ाफ़ा होने लगा था. लिहाज़ा लोगों ने फिर ऊंचाई वाले इलाक़ों में रहना शुरू कर दिया.
पांचवीं सदी में तो बहुत तेज़ी से नई जगहों पर बसावट देखने को मिलती है. इसमें पहाड़ी इलाक़े मुख्य रूप से शामिल हैं. जहां जाकर बड़ी संख्या में लोग बस गए. तीसरी से छठीं सदी तक घाटी में बमुश्किल ही कोई घर बचा था. समाज में तेज़ी से बदलाव आ रहे थे.
मिसाल के लिए धान की फ़सल के रख-रखाव की ज़िम्मेदार स्थानीय मुखिया को दी जाने लगी. जो लोग पहाड़ों में रहने लगे थे वो खेतिहर मज़दूर बन गए. अपनी मेहनत का उन्हें पूरा हिस्सा मिलना बंद हो गया. मैदानों में जिनके पास छोटे ज़मीन के टुकड़े थे वो अलग हो गए और बड़े टुकड़े वाले अलग. और यहीं से समाज में असमानता, अमीर और ग़रीब की रेखा खिंच गई.
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